आरबीआई ने जारी किए बेसल III मार्केट रिस्क के नए दिशानिर्देश: वाणिज्यिक बैंकों के लिए न्यूनतम पूंजी आवश्यकताएं 2026
फरवरी 2023 में जारी ड्राफ्ट गाइडलाइंस पर हितधारकों की प्रतिक्रियाओं पर विचार करने के बाद ये अंतिम रूप में आए हैं। मकसद साफ है—भारत की बैंकिंग व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय बेसल मानकों के अनुरूप बनाना, नियमों को सरल रखना और बैंकों को अपनाने में आसानी देना।

भारतीय रिजर्व बैंक ने 21 सितंबर 2026 को एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। आरबीआई ने वाणिज्यिक बैंकों के लिए बेसल III फ्रेमवर्क के तहत मार्केट रिस्क पर न्यूनतम पूंजी आवश्यकताएं तय करते हुए अंतिम दिशानिर्देश जारी कर दिए हैं। ये दिशानिर्देश Reserve Bank of India (Commercial Banks - Minimum Capital Requirements for Market Risk) Directions, 2026 के नाम से जाने जाएंगे।
फरवरी 2023 में जारी ड्राफ्ट गाइडलाइंस पर हितधारकों की प्रतिक्रियाओं पर विचार करने के बाद ये अंतिम रूप में आए हैं। मकसद साफ है—भारत की बैंकिंग व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय बेसल मानकों के अनुरूप बनाना, नियमों को सरल रखना और बैंकों को अपनाने में आसानी देना।
नया फ्रेमवर्क कब से लागू होगा?
ये दिशानिर्देश 1 अप्रैल 2027 से प्रभावी होंगे। बैंकों को तैयारी के लिए पर्याप्त समय दिया गया है। संक्रमण को आसान बनाने के लिए अप्रैल 2024 से ही इंटरमीडिएट ट्रांजिशन स्केलर लागू हैं। इससे बैंक धीरे-धीरे नए मानदंडों की ओर बढ़ सकेंगे।
ट्रेडिंग बुक की परिभाषा में क्या बदलाव?
ड्राफ्ट में ट्रेडिंग बुक की अलग से परिभाषा थी। अंतिम दिशानिर्देशों में इसे हटा दिया गया है। अब Investment Directions 2025 के तहत ‘Held for Trading (HFT)’ कैटेगरी को ही ट्रेडिंग बुक माना जाएगा। इससे नियमों में स्पष्टता बढ़ी है और दोहरी व्याख्या की गुंजाइश कम हुई है।
बैंकों को साफ चेतावनी दी गई है कि वे पूंजी आवश्यकता कम दिखाने के लिए ट्रेडिंग बुक से बैंकिंग बुक में इंस्ट्रूमेंट्स शिफ्ट न करें। ऐसा करने पर पूंजी गणना पहले और बाद दोनों के आधार पर करनी होगी और अंतर के बराबर अतिरिक्त पूंजी रखनी होगी।
प्रमुख बदलाव जो बैंकों के लिए महत्वपूर्ण हैं
- नेट ओपन पोजीशन और फॉरेक्स रिस्क: आरबीआई के Prudential Norms on Capital Adequacy के दसवें संशोधन के अनुसार संशोधित निर्देश शामिल किए गए हैं। बैंक कुछ संरचनात्मक विदेशी मुद्रा निवेशों को नेट ओपन पोजीशन गणना से बाहर रख सकते हैं, बशर्ते शर्तें पूरी हों।
- ब्याज दर जोखिम का स्पेसिफिक रिस्क चार्ज: टेबल को बेसल कमेटी ऑन बैंकिंग सुपरविजन (BCBS) के दिशानिर्देशों के अनुरूप संशोधित किया गया है। इससे गणना अधिक संक्षिप्त और स्पष्ट हो गई है।
- डेट म्यूचुअल फंड और ETF: ट्रेडिंग बुक में रखे गए डेट म्यूचुअल फंड और एक्सचेंज ट्रेडेड फंड पर पूंजी गणना अब अंतर्निहित जोखिम कारकों पर आधारित होगी। साथ ही पर्याप्त सुरक्षा उपाय भी रखे गए हैं।
- क्रेडिट डेरिवेटिव्स से हेज की गई पोजीशन: टोटल रिटर्न स्वैप जैसी व्यवस्थाओं को भी शामिल किया गया है, जो Master Direction – Reserve Bank of India (Credit Derivatives) Directions, 2026 के तहत अनुमत हैं।
बैंक Simplified Standardised Approach (SSA) का इस्तेमाल करके मार्केट रिस्क के लिए जोखिम भारित परिसंपत्तियों की गणना करेंगे। इसमें ब्याज दर जोखिम, इक्विटी जोखिम और विदेशी मुद्रा जोखिम शामिल हैं।
बैंकों और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
ये दिशानिर्देश भारतीय बैंकों को वैश्विक मानकों के करीब लाते हैं। मार्केट रिस्क का सही आकलन होने से बैंकों की पूंजी पर्याप्तता मजबूत होगी। इससे वित्तीय स्थिरता बढ़ेगी और निवेशकों का विश्वास भी सुधरेगा। छोटे बैंकों के लिए नियम सरल रखे गए हैं ताकि अनुपालन बोझ ज्यादा न पड़े।
आरबीआई का यह कदम बेसल मानकों को अपनाने की उसकी व्यापक रणनीति का हिस्सा है। सरलता, लचीलापन और सहज अपनाने पर जोर दिया गया है। बैंकों को अब 2027 तक अपनी सिस्टम, जोखिम प्रबंधन ढांचे और पूंजी नियोजन को इन नए मानदंडों के अनुसार ढालना होगा।
कुल मिलाकर, आरबीआई बेसल III मार्केट रिस्क पूंजी आवश्यकताएं 2026 भारतीय बैंकिंग क्षेत्र को अधिक मजबूत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में एक ठोस कदम है। बैंकों को इन दिशानिर्देशों का ध्यानपूर्वक अध्ययन कर तैयारी शुरू कर देनी चाहिए।
