सियासी तौर पर योगी सरकार को लगा झटका, तो मई में चुनाव कराने की मंशा हुई पूरी
<div> पंचायत चुनाव आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, योगी सरकार के लिए झटका ही नहीं, राहत भी है</div>

रायबरेली: उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव में 2021 के आरक्षण फॉर्मूले को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने खारिज करते हुए 2015 के चक्रानुक्रम के आधार पर नए सिरे से सीटों के आवंटन व आरक्षण का आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने साफ किया है कि, प्रदेश में पंचायत चुनाव के लिए जारी की नई आरक्षण प्रणाली नहीं चलेगी। बल्कि 2015 को आधार मानकर ही आरक्षण सूची जारी की जाए। अदालत ने कहा कि, 25 मई तक पंचायत चुनाव संपन्न कराए जाएं। कोर्ट के फैसले से एक तरफ योगी सरकार को आरक्षण पर सियासी तौर पर झटका लगा है, तो वहीं दूसरी तरफ मई में चुनाव कराने की मंशा भी पूरी हो गई है।
आपको बता दें कि, दरअसल, यूपी में लंबे समय तक बीजेपी सत्ता से बाहर रही थी। जबकि इस बीच सपा और बसपा को सत्ता में रहने का पंचायत चुनाव में फायदा मिलता रहा है। बीजेपी 2017 में सूबे की सत्ता में लौटी है, और अब उसकी नजर पंचायतों पर सियासी तौर पर कब्जा जमाने की है। माना जा रहा है कि, इसी रणनीति के तहत योगी सरकार ने 2015 के आरक्षण फॉर्मूले में बदलाव कर 1995 को बेस बनाया, ताकि लंबे समय से गांव की पंचायतों पर काबिज विपक्षी दलों के सियासी वर्चस्व को तोड़ा जा सके, लेकिन अब अदालत के फैसले ने अब उसे पलट दिया है। वहीं, दूसरी ओर यूपी सरकार पहले पंचायत चुनाव को मई के महीने में कराना चाहती थी, लेकिन कोर्ट ने उस समय अप्रैल तक कराने की डेडलाइन तय कर दी थी। इसी के मद्देनजर पंचायत चुनाव की तैयारी चल रही थी, लेकिन आरक्षण सूची आने के बाद अब कोर्ट ने सरकार को मई तक चुनाव कराने की तारीख तय कर दी है, जो बीजेपी के मन की मुराद पूरी हो गई है। देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव अप्रैल में होने हैं, जहां सीएम योगी आदित्यनाथ स्टार प्रचारक की भूमिका में है, तो बीजेपी के तमाम नेता चुनावी अभियान में लगाए गए हैं। अप्रैल में पंचायत चुनाव होने की स्थिति में बीजेपी कशमकश में फंसी हुई थी। अब मई में चुनाव कराने का कोर्ट आदेश देकर सरकार की मंशा को पूरा कर दिया है।
अखिलेश सरकार की आरक्षण व्यवस्था:तत्कालीन अखिलेश यादव की अगुवाई वाली सरकार ने साल 2015 के पंचायत चुनाव के पहले पंचायती राज नियमावली में 10वां संशोधन किया था, जिसके तहत ग्राम प्रधान और ग्राम पंचायत सदस्यों के पदों के पहले की आरक्षण प्रणाली को शून्य कर दिया था, और नए सिरे से साल 2011 की जनगणना के आधार पर सीटें तय की गई थीं। इस नियम के तहत यह था कि, आबादी के आधार पर सीटों का आरक्षण तय किया गया था। इस नियमावली के आधार पर साल 2021 की जनगणना होने के बाद 2025 में होने वाले पंचायत चुनाव में इस साल 2022 व साल 2015 के आरक्षण की स्थिति को शून्य कर दिया जाएगा, और फिर नए सिरे आरक्षण का आवंटन किए जाने की व्यवस्था की थी।
योगी आदित्यनाथ की आरक्षण की व्यवस्था: वहीं मौजूदा योगी सरकार ने इसी साल फरवरी में पंचायती राज नियमावली में 11वां संशोधन कर अखिलेश यादव सरकार के फैसले को पलट दिया था। योगी सरकार ने पंचायत आरक्षण लागू करने में साल 1995 को आधार बनाया। इस फॉर्मूले के तहत साल 1995 से जो सीटें कभी भी आरक्षण के दायरे में नहीं आई थीं, उन्हें भी आरक्षित कर दिया गया था। इस फैसले के चलते पंचायत की जो सीटें 1995 से लेकर साल 2015 तक कभी भी अनुसूचित जनजातियों, अनुसूचित जातियों, पिछड़ा वर्ग और महिलाओं के लिए आरक्षित थीं, उन्हें इस बार उसी वर्ग के लिए आरक्षित नहीं किया गया था। ऐसे ही वो सीटें जो कभी भी आरक्षण के दायरे में नहीं आई थीं, उन्हें आरक्षित कर दिया गया था। इससे प्रदेश की सभी पंचायत सीटें पूरी तरह से बदल दी गई थी।
कोर्ट के आदेश के बाद कैसा होगा आरक्षण: हाईकोर्ट के फैसले के बाद योगी सरकार द्वारा बीते दिनों जारी किए गए आरक्षण की स्थिति अब पूरी तरह से बदलना तय माना जा रहा है। योगी सरकार की आरक्षण सूची में पंचायत की ऐसी सीटें भी शामिल हो गई थीं, जहां बीते 25 साल में कभी आरक्षण लागू नहीं हुआ था। फैसला आने के बाद अब नए सिरे से आरक्षण प्रणाली लागू होगी, जोकि आबादी के लिहाज से आरक्षण तय किए जाएंगे। हालांकि, आरक्षण के लिए आधार वर्ष बदला है, लेकिन रोटेशन प्रक्रिया नहीं है। इसके तहत एक तय रोटेशन है। जिसके तहत सबसे पहले एससी-एसटी महिला और फिर एससी-एसटी के लिए आरक्षित होती है। ऐसे ओबीसी महिला, ओबीसी, महिला और जनरल के लिए आरक्षित होती है। एक तरह से 2015 में जो सीट जिसके लिए आरक्षित थी, वो उसके लिए इस बार नहीं होगी।
(Anjul Tyagi)
