पश्चिम बंगाल में चुनावी रण में तश्वीर एक दम ही उलट देखने को मिल रही है। बंगाल की रीढ़ माने जाने वालद्ध ममता दीदी के अक्रामक स्वभाव में अचानक ही हिंदु देवी देवताओं के प्रति लगाव को देखकर हर कोई हतप्रभ है। जहां कभी ममता का ‘खेला होबे’ का नारा गूंज के साथ उछाल कर विपक्षीयों को अपने क्षेत्र से बाहर खदेडऩे वाली ममता मौजूदा चुनावों में कुछ अलग ही रंग लेकर चल रही है। अचानक पश्चिम बंगाल की शेरनी के सुर बदलते नजर आ रहें है। ममता अपनी आक्रामकता भरे स्वभाव को पीछे रख किसी और ही चुनावी ऐजेडे को लेकर चल रही है। जहां दीदी को अपने विकास कार्यो को लेकर जनता के समक्ष जाना चाहिए था, वहां ऐसे में वे चंडी का पाठ करती नजर आ रही है। जबकि उन्हें विपक्ष के सिपहासलारों पर प्रहार का उनके द्वारा किए गए भ्रष्टाचार को उजागर करना था, उन्हें तमाम सरकारों की विफलताओं की कहानी बतानी और पूछनी थी, सात सालों में झूठ के पुलिंदों की गांठे खोल कर रखनी थी, देश की चरमराती आर्थिक दशा को लेकर सात सालों का हिसाब मांगना था। ऐसे में वे अपने गोत्र का ऐलान करते हुए खुद को हिंदु साबित करने में लग गई। अन्य राजनेताओं की भांती ममता भी अब बहुसंख्यक हिंदू का कार्ड और मुस्लिम तुष्टिकरण जैसी बातों में कही न कही फंसती नजर आ रही है।  हालाकि हर कोई ममता को असाधारण महिला की दृष्टी से देखता आ रहा है। 34 साल से वामपंथियों को नाको चने चबाने वाली ममता सामान्य तो नहीं हो सकतीं। परंतु ममता को असमान्य देखने वाले लोगों के बीच इस चुनावी घमासान में बेहद निराशा देखने को मिल रही है। जब ममता ने बंगाल चुनाव में स्वंय कों अहम मुददे से दूर रख कर ज्यादा समय हिंदू दिखाने में लगा रही है। जबकि इस समय ममता के हितेषी उनके उसी अक्रमक रूप को देखना चाहते है, जिसके दम पर वे अब तक बंगाल पर राज करती आ रही थी।
 

क्या बेहतर नहीं होता कि दीदी अपने आप को हिंदु साबित करने की जगह अपने वही अक्रामक तेवर से सरकारों की बखियां उधेड कर सवाल करें कि भष्टाचार, रोजगार, आर्थिक मंदी व किसानों के लिए सरकारे विफल क्यो हो रही है? राजनीति के महत्वपूर्ण मूददो से भटक कर पश्चित बंगाल की शेरनी कही चुनावी रण में कमजोर तो नही पड़ रही हंै। इन मुददों की आंच को यदि जरा सी हवा दे दी जाए तो बंगाल चुनाव का रूख बदल सकता है। हिंदुत्व कार्ड के ट्रेप से दूर होकर यदि इस चुनाव में आम जनता से जुड़े मुददों को उठाया जाए तो दीदी का परचम लोगों को हिट करेगा। शायद फिर से एक बार बदहवास सी इस राजनीति में कोई काम का मुददा देखने को मिल जाए। अन्यथा इस राजनीति गंदा गलीचा अनावश्यक के मुद्दो के बीच मैला होता ही रहेंगा और जनता की आंखों पर विकास का धुंधला चश्मा कोई हटा ही नही पाएगा।
 

(Anjul Tyagi)