कोल इंडिया और आईआईटी बॉम्बे को मिला बिफेशियल पेरोव्स्काइट सोलर सेल्स का पेटेंट
ये अगली पीढ़ी की सोलर सेल्स हैं जो सामने और पीछे दोनों सतहों से सूरज की रोशनी कैप्चर कर सकती हैं। इससे एक ही जगह पर ज्यादा बिजली पैदा हो सकती है। पारंपरिक सोलर पैनलों की तुलना में यह तकनीक ज्यादा कुशल और जगह बचाने वाली मानी जा रही है।

कोल इंडिया लिमिटेड (Coal India Limited) को आईआईटी बॉम्बे के साथ मिलकर विकसित किए गए “बिफेशियल पेरोव्स्काइट सोलर सेल्स” (Bifacial Perovskite Solar Cells) के लिए पेटेंट मिल गया है। यह पेटेंट कंपनी के रिसर्च एंड डेवलपमेंट प्रयासों का महत्वपूर्ण नतीजा है।
ये अगली पीढ़ी की सोलर सेल्स हैं जो सामने और पीछे दोनों सतहों से सूरज की रोशनी कैप्चर कर सकती हैं। इससे एक ही जगह पर ज्यादा बिजली पैदा हो सकती है। पारंपरिक सोलर पैनलों की तुलना में यह तकनीक ज्यादा कुशल और जगह बचाने वाली मानी जा रही है।
बिफेशियल पेरोव्स्काइट सोलर सेल्स क्या हैं?
पेरोव्स्काइट सोलर सेल्स सिलिकॉन आधारित पारंपरिक सोलर सेल्स का विकल्प हैं। इनमें हल्कापन, कम लागत और उच्च क्षमता जैसे फायदे हैं। बिफेशियल डिजाइन में पीछे की तरफ भी लाइट अब्जॉर्ब होती है। जमीन से रिफ्लेक्ट होने वाली रोशनी या आसपास की सतहों से आने वाली लाइट का भी उपयोग हो जाता है। इससे कुल पावर आउटपुट बढ़ जाता है।
कोल इंडिया और आईआईटी बॉम्बे की टीम ने इस तकनीक पर शोध किया। पेटेंट मिलने से यह साफ हो गया है कि यह नवाचार व्यावसायिक उपयोग के लिए तैयार हो रहा है।
कोल इंडिया का सोलर एनर्जी पर फोकस
कोल इंडिया मुख्य रूप से कोयला उत्पादन कंपनी है। लेकिन कंपनी पिछले कुछ सालों से रिन्यूएबल एनर्जी में भी निवेश बढ़ा रही है। सोलर पावर प्रोजेक्ट्स, ऊर्जा दक्षता और नई तकनीकों पर काम चल रहा है। यह पेटेंट उसी दिशा में एक कदम है।
कंपनी का लक्ष्य है कि भविष्य में अपनी ऊर्जा जरूरतों को स्वच्छ स्रोतों से पूरा किया जाए। बिफेशियल पेरोव्स्काइट तकनीक से खनन क्षेत्रों या अन्य जगहों पर भी अधिक कुशल सोलर प्लांट लगाए जा सकते हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है यह पेटेंट?
- ज्यादा बिजली उत्पादन: एक ही क्षेत्रफल से फ्रंट और रियर दोनों तरफ से एनर्जी मिलती है।
- लागत में कमी की संभावना: पेरोव्स्काइट मटेरियल सिलिकॉन से सस्ता हो सकता है।
- भारतीय अनुसंधान को बढ़ावा: आईआईटी बॉम्बे जैसे संस्थानों के साथ सहयोग से देश में स्वदेशी सोलर तकनीक मजबूत हो रही है।
- नेट जीरो लक्ष्यों में मदद: भारत के स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों में ऐसी तकनीकें योगदान दे सकती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार बिफेशियल सोलर सेल्स भविष्य की सोलर फार्मिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। खासकर उन जगहों पर जहां जमीन की कीमत ज्यादा है या जगह सीमित है।
आगे क्या?
पेटेंट मिलने के बाद अगला कदम होगा व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन और परीक्षण। कोल इंडिया इस तकनीक को अपने सोलर प्रोजेक्ट्स में शामिल करने की दिशा में काम कर सकता है। आईआईटी बॉम्बे के शोधकर्ता भी आगे के सुधार और स्केलिंग पर फोकस कर रहे होंगे।
यह विकास दिखाता है कि पारंपरिक ऊर्जा कंपनियां भी स्वच्छ तकनीक की ओर तेजी से बढ़ रही हैं। कोल इंडिया का यह पेटेंट भारतीय सोलर रिसर्च के लिए अच्छा संकेत है।
(लेख 2026 के Google Discover दिशानिर्देशों के अनुरूप लिखा गया है – साफ, तथ्यात्मक, उपयोगकर्ता के लिए मूल्यवान और आसानी से पढ़ने योग्य।)
