टीएमसी ने दिया रिक्शा चालक को टिकट, राजनीति में उतरेगा रिक्शा चालक
<div> नक्सलवाद को छोड़ बना था रिक्शा चालक पढ़िए, पूरी कहानी </div>

पश्चिम बंगाल: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी ने एक ऐसे शख्स को टिकट दिया है, जिसने अपने जीवन में कई संघर्षपूर्ण दौर से गुजरकर आज एक स्थापित और सम्मान की जिंदगी जी रहे हैं। कभी नक्सली आंदोलनों का हिस्सा रहे और फिर बाद में रिक्शा चलाकर जिंदगी जीने वाले मनोरंजन व्यापारी को टीएमसी ने बालागढ़ विधानसभा सीट से अपना उम्मीदवार बनाया है। ऐसा कहा जाता है कि 1920 के दशक के बाद नक्सली राजनीति से हटने के बाद मनोरजंन व्यापारी को एकमात्र जो काम उस वक्त मिल सकता था, वह था बंगाल में रिक्शा चलाने का।
पश्चिम बंगाल के दलित साहित्य अकादमी के चेयरपर्सन और मशहूर दलित लेखक मनोरंजन व्यापारी टीएमसी की टिकट पर हुगली जिले के बालागढ़ से चुनाव लड़ रहे हैं। अपने पुराने दिनों को याद कर वह कहते हैं कि हर दिन मैं अपने यात्रियों के दिशा-निर्देशों का पालन करता था और उन्हें सड़क पर जाम और गढ़ों पर नजर रखते हुए उनके मंजिल तक पहुंचाया करता था।
मनोरजंन व्यापारी पिछले दशक में दलित साहित्य की एक मजबूत आवाज के रूप में उभरे हैं। व्यापारी राजनीति के लिए अजनबी शख्स नहीं हैं। जब वह 1953 में एक राजनीतिक शरणार्थी के रूप में पश्चिम बंगाल आए तो उन्हें कई शरणार्थी शिविरों में रहना पड़ा था। उनके संघर्षपूर्ण जीवन ने उन्हें चाय की दुकानों में बावर्ची और डॉकयार्ड में एक डोम (श्मशान-भूमि की देखभाल करने वाले) के रूप में काम करते देखा है। उन्होंने अपनी जिंदगी में कितना संघर्ष किया है, इसका अदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कभी वह होटलों में काम करते तो कभी वह रिक्शा चलाकर अपनी जरूरतें पूरी करते।
इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, जब 60 के दशक में पश्चिम बंगाल में नक्सली आंदोलन अपने परवान पर था, तब वह इसकी ओर आकर्षित हुए थे। मगर नेताओं की कार्यशैली को देखकर उनका मोहभंग हो गया। इसके बाद लेखक ने किसी भी राजनीतिक संबद्धता से दूरी बना ली और फिर जाति-व्यवस्था को लेकर अपने अनुभवों को लिखने लगे थे और जीवनयापन करने के लिए रिक्शा चलाने लगे। उनकी कई किताबें और उपन्यास आज उपलब्ध हैं। इस तरह से व्यापारी रिक्शा चालक और लेखक के बाद अब एक नई भूमिका में दिखने वाले हैं।
इस बार राजनीति में उतरने के सवाल पर व्यापारी कहते हैं कि आज बंगाल में वह विभाजनकारी राजनीति देख रहे हैं, जिसे बढ़ावा भाजपा दे रही है। आप हवा में जहर महसूस कर सकते हैं। बंगाल में अभी जो हो रहा है, वह अभूतपूर्व है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ और इसे काउंटर करने की जरूरत है। यह हिंसा की राजनीति है। सीएए और एआरसी की ओर इशारा करते हुए व्यापारी कहते हैं कि अगर हम उनकी इस कार्रवाई का विरोध नहीं करेंगे तो वे हमें आउटसाइडर मानकर डिटेंशन कैंप में रख देंगे।
वह आगे कहते हैं कि यही वजह है कि जब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उनके पास पहुंचीं, तो उन्होंने उम्मीदवारी के उनके प्रस्ताव को स्वीकार करने में संकोच नहीं किया। उन्होंने कहा, मैंने पिछले एक दशक में मातुओं [एक अनुसूचित जाति समुदाय] के लिए उनका (ममता) काम देखा है। जब उन्होंने मुझसे कहा कि आपको जिम्मेदारी लेनी होगी तो मेरे पास ना कहने का कोई कारण नहीं था।
बता दें कि ममता बनर्जी ने शुक्रवार को तृणमूल कांग्रेस के सभी 291 उम्मीदवारों की सूची को जारी कर दी। 'बंगाल को चाहिए अपनी बेटी' के नारे पर चुनाव लड़ रहीं ममता बनर्जी ने 50 महिलाओं को चुनाव मैदान में उतारा है तो 42 मुस्लिम और 79 दलित प्रत्याशियों पर भी दांव खेला गया है। इसके अलावा अनुसूचित जनजाति वर्ग के 17 उम्मीदवारों को भी टिकट दिया गया है। बता दें कि 27 मार्च से आठ चरणों में वोटिंग है और 2 मई को नतीजे आएंगे।
(Anjul Tyagi)
