कोरोना से तो नहीं मरेंगे पर रोजी-रोटी की चिंता, घबराहट और तनाव से जरूर जान जाएगी...
<div> आज सुबह से हिमाचल के मुख्यमंत्री का एक फेक संदेश वायरल हो रहा है कि शाम 5 बजे के बाद कर्फ्यू लग रहा है।</div> <div> </div>

आज सुबह से हिमाचल के मुख्यमंत्री का एक फेक संदेश वायरल हो रहा है कि शाम 5 बजे के बाद कर्फ्यू लग रहा है।
उसके बाद अभी एक और समाचार आ गया कि प्रदेश के शिक्षण संस्थान फिर बंद हो गए। दूसरी सूचना तो सही है पर कर्फ्यू वाली फेक न्यूज़ ने फिर आम आदमी को हिलाकर रख दिया है। कई लोगों ने मुझे फ़ोन कर सच्चाई जाननी चाही।
सरकार को सामने आना चाहिए और आम आदमी तक अपना स्पष्ट संदेश पहुंचाना चाहिए। पिछले कई दिनों से शोर मचा हुआ है कि फिर लॉकडाउन ...फिर लॉकडाउन... जो भी लोग चाहे नेता, कर्मचारी, अधिकारी एक बार फिर देश या प्रदेश में लॉकडाउन की पैरवी कर रहे हैं, वे अपनों पदों से त्यागपत्र दें, पेंशन का त्याग करें और एक सामान्य नागरिक के रूप में अपना जीवन शुरू करें।
फिर उन्हें समझ आएगा कि लॉकडाउन का मतलब क्या है... क्या दुष्परिणाम होते हैं... किन दुश्वारियों को झेलना पड़ता है। ए. सी. कमरों और राजसी ठाठ बाठ के बीच लॉकडाउन जैसे पब्लिक डेथ वारंट पर हस्ताक्षर करना बहुत आसान है।
अगर लॉकडाउन का मतलब समझना है तो आम नागरिक (गरीब नहीं ) से पूछो। हर एक व्यवसायी (केमिस्ट, करियाना, सब्जी विक्रेता, कन्फेक्शनरी, हार्डवेयर, गुड्स कैरियर को छोड़कर ) से पूछो तो पता चलेगा कि लॉकडाउन से क्या लुटा।
लॉकडाउन ने कितनी नौकरियां छीनी, कितने घर बिठाए, कितनों को शून्य के बराबर वेतन मिल रहा है, कितनों को फाके लगे। संवेदनशील बनिए। शायद कोरोना किसी परिवार में अगर एक सदस्य को हुआ भी तो उसने उतना नुक्सान नहीं किया, जितना रोजगार छिनने, व्यवसाय चौपट होने से हुआ है। एक साल में करोड़ों लोगों की जमा पूँजी दो वक्त की रोटी में ख़त्म हो चुकी है। अब उनके पास फाकों की नौबत के अलावा कुछ नहीं है।
मानवता के दुश्मन मत बनिए, तानाशाह मत बनिए। सभ्य नागरिक बनिए, संवेदनशील बनिए। बोलना आसान है, कर के दिखाइए। टी -3 का जो कागजी फार्मूला है, उसके तीसरे टी को अमलीजामा पहनाइए, कोरोना भागेगा, मानवता की सेवा होगी और लॉकडाउन की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। इस सब के बावजूद अगर लॉकडाउन लगाना ही है, क्योंकि आपको ऐसा करने की आदत पड़ गई है, तो सबसे पहले हर भारतवासी (गरीबों के अलावा) की रोजी -रोटी की व्यवस्था कीजिये।
मुफ्त का सिलेंडर, मुफ्त के 6000, मुफ्त के चने, मुफ्त में जन धन की सबको अच्छा लगता है। राजनीतिक जनसभाओं पर साल भर की रोक लगाओ, चुनावों पर रोक लगाओ। एक और सुझाव है, क्यों न चारों नगर निगमों के चुनाव प्रचार भी 4 अप्रैल तक रोक देती है सरकार। क्या चुनाव प्रचार से कोविड नहीं फैलता ? पर ऐसा नहीं होगा। सरकार की गलत नीतियों के करण अब जो हालात बन रहे हैं, जो ख़ौफ़ पैदा किया जा रहा है, वह खतरनाक है।
शायद, कोरोना से तो नहीं मरेंगे पर रोजी-रोटी की चिंता, घबराहट और तनाव जरूर जान ले लेंगे।
(Anjul Tyagi)
